Ms. Parsi Garasiya

गरासिया समाज की एक किशोरी, जिसका नाम पारसी है | पारसी झामेला फली की रहने वाली है | इस फली में सड़के, पानी, बिजली, सवास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा एवं अन्य सरकारी सेवाए सबकी स्थिति बदहाल है | घरों की आपस में दूरी भी लगभग 1 किलोमीटर है | पारसी के 2 भाई एवं 6 बहने है, पारसी घर की सबसे छोटी सदस्य है | पारसी के माता-पिता मजदूरी करके अपने परिवार का भरन-पोषण करते है | पारसी अपने पिताजी के साथ बकरिया चराया करती थी | पारसी के घर से विद्यालय लगभग 6-7 दूर किलोमीटर था | विद्यालय के रस्ते में नदी-नाले आते थे | गाँव में शिक्षा की स्तिथि दयनीय होने से पारसी का शिक्षा से कोई रिश्ता नहीं था |

एक दिन पारसी अपने घर के पास ही बच्चो से साथ खेल रही थी तभी दूसरा दशक के कार्मिक उस गाँव में पहुचे | इसी दौरान दूसरा दशक के साथियों ने पारसी से बात की तब उन्हें ज्ञात हुआ की पारसी स्कूल नहीं जाती है | दूसरा दशक के साथियों ने अपने चार माही आवासीय शिविर के बारे में पारसी को बताया | ये सब जानकर पारसी ने पढ़ने इच्छा जाहिर की, लेकिन उसने यह भी बताया की उसके माता-पिता स्कूल नहीं भेजेंगे | तब दूसरा दशक के साथियों ने पारसी के माता-पिता से बात की, लेकिन पारसी की माता ने कहा की वो कैसे रहेगी इतने समय तक अकेले क्योकि वह कभी घर से दूर रही नहीं है | दूसरा दशक के साथियों ने पढाई और चार माही आवासीय शिविर के बारे में उसके माता-पिता को भी काफी समझाया तब वह लोग पारसी को शिविर में भेजने के लिए मान गए |

शिविर का माहौल पारसी के लिए एकदम नया था | क्योकिं गाँव में कच्चे मकान और झोपड़ी ही देखी थी | शिविर पक्के मकान में था, आस-पास पक्के घर एवं बिल्डिंग थी | यह सब देख पारसी को ऐसा लगा की जैसे किसी ने उसे जेल में बंद कर दिया हो | 2-3 दिन शिविर में रहने के बाद पारसी को घुटन सी महसूस होने लगी और वह बिना किसी को बताये शिविर से भाग गयी | इसकी सूचना मिलने पर दूसरा दशक के साथियों द्वारा पारसी को वापस शिविर में लाया गया एवं काफी समझाया | शिविर में पढ़ाने वाली दीदी पारसी से बहुत अच्छे से बात करती थी, नये-नये तरीकों से एवं खेल के माध्यम से पढ़ाती थी, और उसका ख्याल भी रखती थी | यह सब पारसी को अच्छा लगने लगा और वह सबसे घुल-मिल गयी और शिविर में मन लगाकर पढने लगी | क्योकिं शिविर में सिर्फ किताब पढना ही नहीं सिखाते | शिविर में किशोरियों के अनुसार अलग-अलग गतिविधि के माध्यम से पढ़ाते है | शिविर में ही स्वयं और अपने आस-पास की सफाई के बारे में सीखा | पारसी को शिविर में इतना अच्छा लगने लगा की 3 महीने बाद जब उसने यह सोचा की अब सिर्फ 1 महिना ही शिविर में रह पायेगी तो उसके चेहरे पर मायूसी सी आ गयी | जब शिविर के चार महीने पूरे हो गए तो पारसी का घर जाने का मन नहीं करता था, और उसकी आखों में आसू थे क्योकिं वह घर नहीं जाना चाहती थी | उसने अपने माता-पिता के साथ भी जाने से मना कर दिया | शिविर की दीदी द्वारा पारसी को समझाया गया की यह शिविर चार महीने का होता है इसके बाद वह विद्यालय में प्रवेश लेकर अपनी आगे की पढाई जारी रखे | पारसी ने शिविर से कक्षा 3 का स्तर प्राप्त किया था |

घर जाने के 10-12 दिन बाद ही “सर्व शिक्षा अभियान द्वारा” 7 महीने का शिविर प्रारंभ हो गया | पारसी ने उसमे प्रवेश लिया और वहां से कक्षा 7 का स्तर प्राप्त किया | इसके पश्चात् पारसी ने अपने गाँव के विद्यालय में कक्षा 8 में नियमित रूप से प्रवेश लिया और अपनी आगे की पढाई को जारी रखा | पढाई के दौरान ही पारसी दूसरा दशक द्वारा बनाई गयी किशोरी मंच की सदस्य बनी एवं समय-समय पर दूसरा दशक के द्वारा आयोजित किये जाने वाले मेलो में भी भाग लेती रही | गाँव में खीचना, बैर, बहु विवाह, बाल विवाह प्रथा का चलन है | अंधविश्वास के कारण महिलाये प्रसव अस्पताल में नहीं करवाती थी, टीके भी नहीं लगवाती थी और ना ही आयरन की गोलिया खाती थी, काफी अन्धविश्वास फैले है | इस हेतु किशोरी मंच के साथ मिलकर दूसरा दशक द्वारा आयोजित मेलो के माध्यम से महिलाओं को समझाया | ऐसे ही कई प्रयास किये गए और आज गाँव में 95% से भी अधिक महिलायें अपना प्रसव अस्पताल में करवाने लगी है, एवं टीके लगवाने के लिए भी स्वयं पहल करके अस्पताल जाती है |

पारसी के गाँव में खीचना प्रथा बहुत प्रचलित है | यह एक ऐसी प्रथा है जिसमे मेले का आयोजन करवाकर लड़का एवं लड़की एक दूसरे को पसंद करके शादी कर सकते है | इससे कम उम्र (10 से 12 बर्ष) में ही शादी हो जाती है एवं कम उम्र में ही बच्चे होने से स्वास्थ्य की स्तिथि ख़राब हो जाती है |

पारसी के गाँव में बिजली की समस्या कई वर्षो से थी | बिजली नहीं होने के कारण पारसी ने भी अपनी 8 वी कक्षा की पढाई दीपक की रोशिनी में की थी | गाँव में बिजली व सड़क हेतु किशोरी मंच ने कम्युनिटी के साथ मिलकर कई धरने दिये, अब गाँव में पिछले 1 साल से बिजली की सुविधा है और सड़के भी बन गयी है |

पढाई के दौरान स्कूल में एक शिक्षक थे जो रोज शराब पीकर आते थे और सभी से अभद्रता से व्यवहार करते थे | पारसी ने परेशान होकर अपने साथियों के साथ मिलकर पाली जिला के कलेक्टर जनसुनवाई कार्यक्रम में इस मुद्दे को बताया | कलेक्टर द्वारा पारसी को शाबाशी दी गई एवं तत्काल रूप से उस शिक्षक को निलंबित भी किया गया |  

एक वो वक़्त था जब पारसी आवासीय शिविर में आकर भी घर भाग गयी थी | आज पारसी बहुत खुश है क्योकिं अब वो शिविर में सहभागियों को पढ़ाती है | इससे पारसी की आर्थिक स्थिति भी कुछ हद तक मजबूत हुयी है | अब वह अपने परिवार को आर्थिक रूप से सहयोग भी कर रही है इससे उसके माता-पिता भी खुश है | पारसी आज बी.ए., बी.एड. है और दूसरा दशक के शिविर में शिक्षिका के रूप में कार्य कर रही है | इसके साथ ही अब पारसी गाँव के स्तर पर किशोरियों को शिविर हेतु तैयार करना, अंधविश्वास व नशे के खिलाफ जाग्रत करने का भी कार्य कर रही है | पारसी द्वारा महिलाओं व् किशोरियों के लिए विशेषकर योगदान देना तथा उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास भी कर रही है 

पारसी कहती है की अगर वह दूसरा दशक के शिविर से नहीं जुडी होती तो आज वह भी गाँव की कई अन्य किशोरियों की तरह अनपढ़ रह जाती एवं उसकी भी जल्दी शादी हो जाती |  

Ms. Parsi Garasiya